- परमाणु संरचना
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संपूर्ण जगत में व्याप्त दर्द की मूलभूत संरचना के विषय में मानव मन में प्राचीन काल से ही जिज्ञासा रही है आधुनिक वैज्ञानिक सन कल्पनाओं के विकास एवं अन्य साधनों से हजारों वर्ष पूर्व को भारतीय एवं यूनानी दार्शनिकों ने दर्द की मूलभूत संरचना के विषय में भी मेहनत किए गए हैं
भारतीय दर्शन में परमाणु वाद
भारतीय दर्शन में सृष्टि के मूल में महापंचायत की संकल्पना की गई है जिसमें वायु अग्नि जल पृथ्वी तथा आकाश को दर्द का मूल तत्व माना गया है इसी दार्शनिक परंपरा की एक शाखा वैश्विक दर्शन में महर्षि कणाद छठी शताब्दी ईसा पूर्व में सृष्टि के मूल तत्व में चार प्रकार के तत्व वायु अग्नि जल तथा पृथ्वी को स्वीकार किया गया है महर्षि कणाद के अनुसार यदि किसी धर्म को लगातार विभाजित किया जाए तो अंततः उच्चतम प्राप्त होता होगा जिसे और विभाजित करना संभव नहीं होगा महर्षि कणाद ने उस अभिभाषण को परमाणु यानी कि परमाणु कहा एक अन्य भारतीय दर्शनिक परम का चयन के अनुसार मूल कण स्वतंत्र अवस्था में नहीं बल्कि संयुक्त अवस्था में पाए जाते हैं तथा इनका विभिन्न परिणाम के संयोजन ही दर्द को विभिन्न रूप प्रदान करता है
यूनानी दर्शन में परमाणु वाद
पांचवी शताब्दी ईस्वी पूर्व यूनानी दार्शनिक ल्यूसिप्पस तथा डेमोक्रेटिक ने प्रतिपादित किया कि सभी पदार्थों का निर्माण विभिन्न प्रकार की माताओं एवं अभिभावकों से हुआ है उन्होंने इन गुणों को एटम तथा एडम्स नांदिया जिसका शाब्दिक अर्थ है और विभाग तत्पश्चात में एपिकुरा तथा लुक रेडियस आदि ने अनेक दार्शनिकों ने भी परमाणु वाद पर अनेक मत प्रस्तुत किए
रासायनिक संयोजन के नियम
1 दार्शनिक परमाणु वाद केवल संकलन प्रणव पर आधारित था यह संकल्पन आए ना तो किसी अनुसंसाधन का परिणाम थी और ना ही मध्यकाल तक इंसान कल्पनाओं की सिद्धि के लिए वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा अनुसंधान किए गए थे 18 वीं शताब्दी के अंत में परमाणुओं तथा उनके रासायनिक संयोजन के संबंध में दो महत्वपूर्ण नियम प्रतिपादित किए गए थे यह नियम वैज्ञानिक प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षण पर आधारित है
ब्राह्मण संरक्षण का नियम 1789 में एंटोनी लगा के द्वारा प्रतिपादित किया गया था इसके अनुसार किसी रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेने वाले अभिकारक हो कि मूल धर्म तथा अभिक्रिया से प्राप्त उत्पादों के कुल द्रव्यमान में कोई अंतर नहीं होता है अर्थात रासायनिक अभिक्रिया में ना तो द्रव्यमान का सृजन किया जा सकता है और ना ही उसका विनाश किया जा सकता है
स्थिर अनुपात का नियम यह नियम 1799 इसी में जो सेफ लुईस प्राउस्ट के द्वारा प्रतिपादित एवं सिद्ध किया गया था इस नियम के अनुसार प्रत्येक योगिक दो या दो से अधिक तत्व का संयोजन में सम्मिलित तत्वों का अनुपात सदैव निश्चित होता है उदाहरण स्वरूप जल योगिक में हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन के द्रव्यमान का अनुपात सदैव (1:8)होता है इसीलिए वर्षा नदी तालाब के जल तथा प्रयोगशाला में निर्मित जल में भी हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन का अनुपात (1:8)विद्वान होगा
डाल्टन का परमाणु सिद्धांत
1808 ऐसी में ब्रिटिश वैज्ञानिक जॉन डाल्टन ने पहली बार दार्शनिक तारों से अलग एवं वैज्ञानिक ढंग से परमाणु सिद्धांत की व्याख्या की इस सिद्धांत के प्रमुख बिंदु निम्न है
1.सभी पदार्थ अत्यंत छोटे कन से निर्मित होते हैं जिन्हें हम परमाणु कहते हैं
2. किसी एक तत्व के सभी परमाणु आकार द्रव्यमान तथा अन्य रासायनिक गुणों से सामान होते हैं जब के भिन्न तत्व के परमाणु परस्पर भिन्न होते हैं
3.परमाणु अविभाज्य एवं अविनाशी होते हैं अर्थात परमाणु ना तो निर्मित किया जा सकता है और ना ही नष्ट
4.विभिन्न तत्वों के परमाणु साधारण पूर्ण संख्या के अनुपात में परस्पर सहयोग करते हैं जिसे हम योगिक का निर्माण होता है
5. रासायनिक अभिक्रिया में तत्व के परमाणु संयुक्त पृथक तथा पूर्णा व्यवस्थित होते हैं
परमाणु Atom
परमाणु पदार्थ की संरचनात्मक इकाई है यह किसी तत्व का हुआ छोटा भाग है जिसमें उस तत्व के सभी रासायनिक गुण उपस्थित होते हैं प्रत्येक तत्व कुछ विशिष्ट प्रकार के परमाणुओं से निर्मित होते हैं इसलिए ब्राह्मण में कितने तत्व है उतने प्रकार के परमाणु भी है
अनु-molecule
अनु किसी तत्व अथवा योगिक का वह छोटा particle है जो स्वतंत्र रूप में अस्तित्व में रह सकता है तथा उस तत्व अथवा योगी के सभी रासायनिक गुण को प्रदर्शित करता है परंतु यह किसी रासायनिक अभिक्रिया में भाग नहीं ले सकता एक अनु में एक ही तत्व अथवा एक से अधिक तत्व के परमाणु रसायनिक बंधुओं के द्वारा परस्पर संबंध रहते हैं
अनुओ के प्रकार
1st सम अनु 2nd विषम अनु



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